भारतीय सांस्कृतिक अवबोध : जड़ों से जुड़ने की एक पहल
रायपुर। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के साहित्य एवं भाषा अध्ययन शाला में 15 जुलाई 2025 को आयोजित “भारतीय सांस्कृतिक अवबोध” विषयक एक दिवसीय व्याख्यान केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक चेतना को पुनः जागृत करने का सार्थक प्रयास सिद्ध हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. मधुलता बारा ने की, जबकि संयोजन डॉ. गिरजा शंकर गौतम एवं डॉ. स्मिता शर्मा द्वारा किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सच्चिदानंद शुक्ल का मार्गदर्शन आयोजन की सफलता में सहायक रहा।
प्रमुख वक्ता प्रो. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी ने संस्कृति और परंपरा की विविध धाराओं को एक सूत्र में पिरोते हुए न केवल ज्ञान का विस्तार किया, बल्कि श्रोताओं को आत्मचिंतन की ओर भी प्रेरित किया। उन्होंने सूर्य को ज्ञान एवं ऊर्जा का प्रतीक बताते हुए नामकरण संस्कार, सोहर गीत, रामायण, कालिदास एवं भारतीयभरतमुनि के रस सिद्धांत — विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से रस निष्पत्ति — की व्याख्या ने सौंदर्यबोध के गूढ़ पक्षों को उजागर किया। संस्कृत श्लोकों और साहित्यिक उदाहरणों ने वक्तव्य को गहनता प्रदान की। संस्कृति की व्यापकता को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. गौतम द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन में वही आत्मीयता झलकी, जो हमारी सांस्कृतिक परंपराओं की विशेषता रही है।
ऐसे आयोजन हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का अवसर प्रदान करते हैं। आज की पीढ़ी को भारतीयता का बोध कराना समय की आवश्यकता है, और यह व्याख्यान उसी दिशा में एक प्रभावशाली कदम था।
