November 5, 2026

भारतीय तीरंदाजों ने रचा इतिहास, गणेश मणि रत्नम ने जताई खुशी

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नई दिल्ली। जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियाई खेल 2026 में भारतीय तीरंदाजों के शानदार प्रदर्शन ने देश को गौरवान्वित किया है। भारतीय तीरंदाजी दल ने प्रतियोगिता में कुल नौ पदक जीतकर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। इनमें पांच स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य पदक शामिल हैं। इस उपलब्धि पर भारतीय कंपाउंड तीरंदाज गणेश मणि रत्नम थिरुमुरु ने खुशी जताई है। उन्होंने इसे भारतीय तीरंदाजी के भविष्य के लिए बेहद सकारात्मक उपलब्धि बताया।

गणेश स्वयं भी प्रतियोगिता में स्वर्ण और कांस्य पदक जीतने वाले खिलाड़ियों में शामिल रहे।एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन कंपाउंड और रिकर्व, दोनों वर्गों में शानदार रहा। भारतीय खिलाड़ियों ने दुनिया के मजबूत तीरंदाजी देशों के खिलाफ बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए पदक हासिल किए। विशेष रूप से दक्षिण कोरिया और चीन जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ मिली सफलता ने भारतीय तीरंदाजी की बढ़ती ताकत को उजागर किया है।गणेश मणि रत्नम ने पुरुष कंपाउंड टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। इस टीम में उनके साथ साहिल जाधव और कुशल दलाल शामिल थे।

भारतीय टीम ने फाइनल में चीन को रोमांचक मुकाबले में 238-237 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। मुकाबले के दौरान दोनों टीमों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने दबाव में संयम बनाए रखा और निर्णायक क्षणों में शानदार निशाने लगाए।टीम स्पर्धा में शानदार जीत हासिल करने के बाद गणेश मणि रत्नम ने पुरुष व्यक्तिगत कंपाउंड वर्ग में भी अपना दमखम दिखाया। उन्होंने कांस्य पदक मुकाबले में वियतनाम के कोंग डुक डांग को 149-144 से हराया। इस मुकाबले में गणेश की निशानेबाजी बेहद सटीक रही। उन्होंने शुरुआत से ही बढ़त बनाए रखी और प्रतिद्वंद्वी को वापसी करने का ज्यादा अवसर नहीं दिया।

उनका यह प्रदर्शन इसलिए भी खास रहा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यक्तिगत स्पर्धाओं में सफलता हासिल करना किसी भी तीरंदाज के लिए बड़ी चुनौती होती है। टीम स्पर्धा में खिलाड़ियों को साथियों का सहयोग मिलता है, जबकि व्यक्तिगत मुकाबले में हर निशाने का दबाव खिलाड़ी को स्वयं संभालना पड़ता है।आंध्र प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले गणेश मणि रत्नम ने अपने पहले एशियाई खेलों में दो पदक जीतकर विशेष पहचान बनाई।

उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय कड़ी मेहनत, नियमित अभ्यास, प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन और परिवार के समर्थन को दिया है। गणेश के अनुसार, बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में मानसिक मजबूती उतनी ही आवश्यक होती है जितनी तकनीकी दक्षता।गणेश ने कम उम्र में ही तीरंदाजी के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने वर्ष 2016 में इस खेल की ओर कदम बढ़ाया था। शुरुआत में उनकी रुचि कराटे में थी, लेकिन तीरंदाजी का प्रदर्शन देखने के बाद उन्होंने इसी खेल में आगे बढ़ने का फैसला किया।

धीरे-धीरे उन्होंने नियमित प्रशिक्षण शुरू किया और अपनी प्रतिभा के दम पर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने में सफलता हासिल की।एशियाई खेलों में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में महिला रिकर्व तीरंदाजी टीम का स्वर्ण पदक भी शामिल रहा। अंकिता भगत, कुमकुम मोहोड और कीर्ति शर्मा की भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस जीत ने भारतीय महिला तीरंदाजी के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा।

युवा तीरंदाज कुमकुम मोहोड ने महिला व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में भी स्वर्ण पदक हासिल किया। उनके प्रदर्शन को भारतीय तीरंदाजी के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने अनुभवी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के खिलाफ शानदार निशानेबाजी करते हुए अपनी प्रतिभा साबित की।इसके अतिरिक्त मिश्रित रिकर्व टीम स्पर्धा में कुमकुम मोहोड और धीरज बोम्मदेवरा की जोड़ी ने रजत पदक जीता। पुरुष रिकर्व टीम ने भी रजत पदक हासिल किया, जबकि नीरज चौहान ने पुरुष व्यक्तिगत रिकर्व वर्ग में कांस्य पदक जीतकर भारत की पदक संख्या बढ़ाई।कंपाउंड तीरंदाजी में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन विशेष रूप से प्रभावशाली रहा।

भारत ने पुरुष टीम, महिला टीम और मिश्रित टीम की तीनों स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक हासिल किए। महिला कंपाउंड टीम में ज्योति सुरेखा वेन्नम, पृथिका प्रदीप और चिकिथा तनीपार्थी शामिल थीं। इस टीम ने चीन के खिलाफ शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता।वहीं, मिश्रित कंपाउंड टीम स्पर्धा में साहिल जाधव और चिकिथा तनीपार्थी ने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। इस तरह भारतीय कंपाउंड तीरंदाजों ने तीनों टीम स्पर्धाओं में अपना दबदबा कायम रखा।

भारतीय तीरंदाजी दल की इस सफलता में खिलाड़ियों के साथ प्रशिक्षकों और सहयोगी स्टाफ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। कंपाउंड तीरंदाजी कोच डेव कजिन्स ने भारतीय खिलाड़ियों की उपलब्धि पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि बेहतर प्रशिक्षण, सही तैयारी और मजबूत सहयोगी व्यवस्था से बड़े अंतरराष्ट्रीय परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

 

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