June 17, 2026

छतीसगढ़ी लोककथाएँ भारतीय संस्कृति का सार हैं : महेंद्र मिश्र

DSc7625

अखिल भारतीय जनजातीय लेखक सम्मेलन का आयोजन

रायपुर। साहित्य अकादमी नई दिल्ली के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि साहित्य अकादमी का कार्य साहित्यकारों को समाज के विषय में लेखन करने के लिए जगाना है। जनजातीय बोलियों में वाचिक परंपराओं में संरक्षित संस्कृति को लिखने की आवश्यकता है। उन्होंने रायपुर में आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय जनजातीय लेखक सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में देश भर के आए जनजाति विषयों के लेखकों को संबोधित किया। श्री कौशिक ने कहा, औपनिवेशिक काल में भारत की भाषा, संस्कृति, परंपराओं को लेकर हमारे मन में हीनभावना भरी गई, इस कारण अपनी बोली और भाषा पर हमें आज भी गौरव नहीं है।
मुख्यातिथि की आसंदी से बोलते हुए साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने कहा कि इस आयोजन में देश भर के जनजाति लेखक जुटे हैं इस सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के भी जनजाति बोली और भाषा के लेखकों को शामिल किया गया है। इस सम्मेलन के माध्यम से परस्पर जनजाति भाषाओं और संस्कृतियों का प्रसार होगा। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में ग्राम्य और अरण्य संस्कृति और परम्परा के मूल तत्व एक हैं, अलग अलग भाषा में व्यक्त होने के कारण समझ बदल जाती है। इन वाचिक परंपराओं को लिखने से एक दूसरे समाज के प्रति समझ बढ़ेगी और एकात्म का भाव जागेगा।

बीज वक्तव्य रखते हुए महेंद्र मिश्र ने कहा, आदिवासी लोकगीत और साहित्य स्वदेशी जान, सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरणीय ज्ञान का एक जीवंत और गतिशील संग्रह है। छत्तीसगढ़ में, गोंड, भतरा, बैगा, उरांव, हलबा, दुरुआ, पंडो, पहाड़ी कोरवा और कमार जैसे विविध आदिवासी समुदायों के साथ, ये परपराएँ स्थानीय विरासत को संरक्षित करने में एक आधारभूत भूमिका निभाती हैं। यह शोधपत्र भाषाई विविधता, पारिस्थितिक अंतर्दृष्टि, सामाजिक मूल्यों और राजनीतिक एजेंसी को बनाए रखने में आदिवासी लोकगीतों के महत्व की खोज करता है। यह पुस्तक लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण और सांस्कृतिक स्मृति को बनाए रखने में आदिवासी साहित्य की भूमिका की जांच करती है, साथ ही इस महत्वपूर्ण कार्य में लगे वि‌द्वानों और संस्थानों के योगदान पर प्रकाश डालती है।

भारत के आदिवासी समुदाय सांस्कृतिक, भाषाई और पारिस्थितिक ज्ञान के विशाल भंडार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें से अधिकांश मौखिक परंपराओं में निहित हैं जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं। छतीसगढ, असंख्य आदिवासी समूहों का घर है, जो सांस्कृतिक स्थिरता में लोककथाओं की भूमिका की जांच करने के लिए एक अ‌द्वितीय स्थल है। यह निबंध आदिवासी लोककथाओं और साहित्य को संरक्षित करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देता है, पहचान को आकार देने, ज्ञान प्रणालियों को संरक्षित करने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका को पहचानता है।
आदिवासी लोककथाएँ पारिस्थितिक ज्ञान का खजाना हैं जिसे आधुनिक दुनिया नए विज्ञान के रूप में कहती है। भूमि के वनस्पति और जीव मौखिक परंपरा में प्रकट होते हैं जो जीवित परंपरा में जान के सामान्य भंडार को साझा करने वाले लोगों की सामूहिक स्मृति को व्यक्त करते हैं। छतीसगढ़ी लोककथाएँ भ्रष्ट नहीं हैं और इसमें मौखिक परंपरा, और अनुष्ठान, मंदिर की कहानियाँ और कला और वास्तुकला में भारतीय संस्कृति का सार है।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति केसरी लाल वर्मा ने कहा, दूसरे सत्र में संस्कृति संरक्षण में जनजातीय भाषाओं का महत्व विषय पर आलेख पाठ किए गए जिसकी अध्यक्षता की संस्कृति विभाग के संचालक विवेक आचार्य ने की।
डॉ रामकोटि पवार, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद के प्रोफेसर ने कहा जनजातीय भाषाएं और बोलियां प्राकृतिक रूप से जन्म लेती हैं। शास्त्रीय भाषाएं जनजातीय बोलियों पर दबाव डाल रही हैं, इस कारण जनजातीय बोलियों में परिवर्तन हो रहा है। मातृभाषा से ही बहुभाषा ओर जाएंगे जैसे बंजारा बोली मातृभाषा है लेकिन तीन किलोमीटर दूर स्कूल में तेलुगु भाषा में पढ़ाई करना पड़ती है। इससे पहले हमें तेलुगु भाषा सीखनी पड़ती है, इसके बाद मेरी शिक्षा शुरू होती है। सोचता मातृभाषा में हूं उसे अन्य भाषा में अनुवादन करके उसका प्रयोग करते हैं। भाषा से ही संस्कृति है इसलिए धीरे धीरे मातृभाषा को भूलकर दूसरी भाषा को अपनाते हैं तो अपनी संस्कृति भी छूटती जाती है। भारत में पिछले 60 वर्षों में 200 भाषाएं और स्थानीय बोलियां लुप्त हो गई और 150 लुप्त होने की स्थिति में है। जनजातीय बोलियों को संरक्षित करने का प्रयास होना चाहिए। इसके लिए स्कूल के प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा में पढाई शुरू हो चुकी है। जनजातीय समाज में परंपरागत ज्ञान का भंडार है, आज शहरों में वास्तुशास्त्र का चलन बढ़ा है जबकि जनजाति समाज हजारों साल से वास्तु के हिसाब से अपना घर बना रहेंगे।
मध्यप्रदेश से आई श्रीमती माधुरी यादव ने कहा, जनजाति संस्कृति में कृषि मौसम के प्रारंभ में सभी किसान अपने बीज एक स्थान पर लाकर उसे अभिमंत्रित किया जाता है, पूजा की जाती है। इसे बोने के बाद पौधा उपजने के बाद फिर प्रार्थना की जाती है। फिर नवाखाई, इस प्रकार प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई जाती है। यह सभी जानकारियां वाचिक परंपरा में है, इसे लिखने से जनजातियों की ज्ञान परंपरा को समझने में मदद मिलेगी। ऐसे ही जनजाति पूजा पद्धति, देवी देवताओं, पर्व के बारे में लिखा हुआ कम मिलता है। इसे लिखने की आवश्यकता है। ध्यान हो कि इससे उनकी शुद्धता का अंत न हो जाएं। कई ऐसे ज्ञान है जो वैज्ञानिकों के लिए भी शोध का विषय हो सकता है। जनजाति भाषा की भी शब्दावली है उनको भी संकलित करने की आवश्यकता है।
राजस्थान के उपेन्द्र अणु ने कहा, राजस्थान, मराठी और गुजराती लोक भाषाओं में गीत गाए जाते हैं। मराठी में तुकाराम जी ने अभगों की रचना की है। मराठी गीत, नृत्य, पर्वों की अपनी विशेषताएं हैं। गुजरात में आदिवासी समाज देह दिवाली में अपने पितरों की पूजा की जाती है। आदिवासियों का होलिका त्यौहार भी महत्व का है। राजस्थानी भाषा की अनेक बोलियां हैं मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती जैसी बोलियों का अपना महत्व है। इन बोलियों में अनेक साहित्यों की रचना की गई है। इनमें लोक परंपराओं और संस्कृतियों की विशेषताओं का वर्णन मिलता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में विवेक आचार्य ने कहा ने कहा, बोलियां शिक्षा, धर्म और समाज के बारे में बताती हैं। छत्तीसगढ़ में कहावत है, कोस कोस में पानी बदले, कोस कोस में बानी। छत्तीसगढ़ राज्य अनेक राज्यों के साथ अपनी सीमा साझा करता है इसलिए अनेक भाषा, बोली, और संस्कृति को साझा करते हैं। दक्षिण छत्तीसगढ़ में तेलुगु, तमिल, कन्नड़ भाषाओं का प्रभाव है। वैसे ही ओडिशा, झारखंड और महाराष्ट्र की भाषाओं का प्रभाव दिखता है। उन्होंने आलेख पाठ करने वाले वक्ताओं के विचारों अपनी बात रखी।

बहुभाषीय कथा पाठ विषय पर आधारित द्वितीय सत्र की अध्यक्षत डॉ. वी. रामकोटी ने की। इसमें श्री नीलूराम कोर्राम (गोंडी), श्री एनाम गोमांगा (सौरा), श्री शिवशंकर कश्यप (भतरी) तथा सुश्री जयश्री साहू (कोशली) अपनी कहानियाँ प्रस्तुत की। बहुभाषीय काव्य-पाठ विषय पर आधारित इसमें सुश्री संतोषी श्रद्धा ‘महंत’ ने बिलासपुरी, दीनदयाल साहू ने छत्तीसगढ़ी, सुश्री सावित्री ध्रुव ने गोंडी, डॉ. संजु साहू ‘पूनम’ ने संभलपुरी तथा धर्मानंद गोजे ने सरगुजिया बोलियों में कविता-पाठ किया । इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. माधुरी यादव ने की।