युवाओं को लोभ-क्रोध-काम के नुकसान का परिचय
युवावस्था में चुनौतियों का सामना करना महत्वपूर्ण है। लोह, क्रोध और काम, ‘नरक के तीन द्वार’, हमारे पतन के कारण बन सकते हैं। अधिक पाने की इच्छा, अनियंत्रित क्रोध और अत्याधिक कामना हमें ध्येय से भटका सकते हैं। इन पर विजय पाने के लिए आत्म-जागरूकता, अनुशासन और भगवान श्री कृष्ण के मार्गदर्शन की आवश्यकता है।
युवावस्था हमे चुनौतियों पर विचार कर, उन्हें दूर करने का एक अवसर है। अपने भावनाओं को नियंत्रण मे लाने का एक समय भी है। अनंत श्री विभूषित जगद्गुरु श्री प्रियदर्शी जी महाराज द्वारा रचित, अभूतपूर्व ग्रंथ ‘श्रीकृष्ण चरित मानस’ (रसायन महाकाव्य) मे मनुष्य के उन तीन भावों को नियंत्रित करने का मार्ग बताया गया है, जो हमारे पतन का कारण बन सकता हैं – लोभ, क्रोध और काम, ‘नरक के तीन द्वार’ , जो हमे विचलित कर हमारे ध्येय प्राप्ति के मार्ग पर बाधा डाल सकते है। आइए जानते है नरक के इन तीन द्वारों के बारे में, नरक का पहला द्वार लोभ, अधिक पाने की इच्छा। अधिक धन, अधिक शक्ति, और अधिक संपत्ति हममें सिर्फ असंतुष्ट की भावना पैदा करवाता है।
लोभ हमेशा ही अनैतिक व्यवहार, शोषण और हिंसा को जन्म देता है। हममें क्रोध की उत्पत्ति करवाता है। क्रोध, नरक का और एक द्वार, एक शक्तिशाली अस्त्र जो हमें जल्द ही अनियंत्रण का शिकार बना देता है। यह हमें गलत निर्णय लेने को मजबूर करता है, जिससे हम अपने ध्येय से कोसों दूर जाकर गिर सके। क्रोध रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकता है और हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। क्रोध हमारे अंदर हिंसा को भी जन्म देता है।
नरक का तीसरा और अंतिम द्वार है काम, यह अत्याधिक या अनियंत्रित हो तो यह हमे विनाश के द्वार पर खड़ा कर सकता है। हमारी अधूरी इच्छाएं हममे निराशा पैदा करती है, और निराशा व्यसन को जन्म देती हैं। इन तीन शक्तियों पर विजय पाने के लिए आत्म-जागरूकता, अनुशासन और व्यक्तिगत विकास के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। और इसी के लिए वर्तमान मे हमें भगवान श्री कृष्ण के बताए मार्ग पर चलना बहुत जरूरी है। जिससे हम एक शांत और खुशहाल जिंदगी जी सके।
डा. श्रीकृष्ण किंकरजी महाराज
