हिरेश सिन्हा: छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के सशक्त ध्वनि
आदिवासी संस्कृति के ऊपर हम तो आदिवासी आन गीत ने समुचे 36 गढ़ को झुमने और थिरकने पर मजबुर कर दिया
इतेश सोनी रायपुर – छत्तीसगढ़ की लोक गायकी में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले हिरेश सिन्हा, जिसे “छत्तीसगढ़ी की आवाज” के नाम से भी जाना जाता है,अपनी सुमधुर आवाज और दिल छूने वाले गीतों से लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। उनका संगीत न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत में लोक संगीत के प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय है। हिरेश सिन्हा का जन्म छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में हुआ था, ग़रीबी, लाचारी से उनका जीवन का प्रारंभ हुआ हिरेश सिन्हा जब 6 माह के थे तभी उनके माता पिता जीवन यापन करने के लिए जन्म भूमि ग्राम मोखा को छोड़कर कर्म भूमि ग्राम सिरसिदा आए, वही किराए से मकान लेकर, पढ़ना लिखना प्रारंभ किए गीत गाना 8 वी पढ़ने के बाद शुरू किए थे रेडियो सुनकर संगीत की यात्रा प्रारंभ किए गांव में रामायण होता था वहीं वो जाया करते थे उन्हें कुछ लोगों का खूब ताना मिला उलाहना मिला,, ठोकर मिला, ताने मिले। उनकी रुचि गीत लेखन में था कविता शायरी लिखा करते थे गीत गाना बाद में प्रारंभ किए 
उनका पहला गीत
“तोला गाड़ा गाड़ा जोहार प्रभु” था जिसे सुनकर लोगों ने उन्हें खूब सराहा और इसके बाद उनकी संगीत यात्रा एक नई दिशा में बढ़ी।
हिरेश सिन्हा के गीतों में छत्तीसगढ़ी संस्कृति की गहरी झलक मिलती है। उनका हर गीत छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, प्रेम, दुख और संघर्ष को व्यक्त करता है। कुछ सुपरहिट गीत जैसे “मोला तोर संग मया हे”,
“तोर सुरता आथे वो गोरी”
“तै कोन गांव रहिथस”
“गोंदा फूल केरा बारी मा”
“आंखी ले बरसे आंसू”
“कारी सवरेंगी””तै कोन गाँव रहिथस
“मैं का करव, शीतल कर शीतला दाई फिर 
झूम लेबो बस्तरिहा गाना “”सुपर हिट हुवा,जो एक ही महीने में 1 करोड़ 16 लाख दर्शकों का प्रेम मिला,, इस गीत पर विदेशी कलाकारों ने भी रील बनाया कई राज्यों में इस गीत का चलन खूब हुआ लोकप्रियता को और बढ़ाया। हिरेश सिन्हा का 36 गढ़ी संगीत जगत में मोकाम हासिल करने में उनकी धर्म पत्नी श्री मति जितेश्वरी सिन्हा जी का बहुत बड़ा योगदान है वो भी गीत लिखती हैं और गाती भी हैं जितने सुपर हिट गीत हुए हैं उनके ही लिखे गीत हैं और वो मानस जगत में व्याख्या करती हैं।।
आदिवासी संस्कृति के ऊपर हम तो आदिवासी आन गीत ने समुचे 36 गढ़ को झुमने और थिरकने पर मजबुर कर दिया
समाज को आईना दिखलाने वाला इनके कई गीत आए
“”तोला का बलि मैं देवव दाई””
“करनी के मैं फल पाहूं”
“बेटी बनके आबे”
इनकी कलाकरी में सभी रसों का समावेश होता है
रुलाते भी हैं हंसाते भी हैं , प्रेम का अंदाज भी देते हैं और लोगों में वीर रस का संचार भी करते हैं और राष्ट्र के प्रति समर्पित होने का संदेश भी देते हैं ।उनकी आवाज़ में एक खास मिठास और दर्द दोनों का मेल है, जो श्रोताओं को गहरे तक छू जाता है।
इतिहास में दर्ज कई कलाकारों से इतर, हिरेश सिन्हा का मानना है कि संगीत केवल कला नहीं, बल्कि यह आत्मा की भाषा है। वह अक्सर कहते हैं, “संगीत बिना जीवन अधूरा है, यह मानवता की आवाज है।”
“सुर सजे ना सजे गुनगुनाते रहो”
” दर्द में भी सदा मुस्कुराते रहो”
उनका संगीत छत्तीसगढ़ी समाज की आवाज बन चुका है, और वह हमेशा अपनी कला के माध्यम से अपने राज्य और संस्कृति का प्रचार करते रहे हैं। इनकी गायकी ने ना केवल छत्तीसगढ़ के लोक संगीत को पहचान दिलाई है, बल्कि पूरे देश में लोक गायन के प्रति सम्मान और प्रेम बढ़ाया है। उनका संगीत और उनके द्वारा गाए गए लोकगीत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे। उनका एक कथन हैं अपना आदर्श कृष्ण की तरह जीने वालों को बनाए शकुनि जैसे जीने वालों को नहीं
