May 9, 2026

न्याय की जीत ही वकालत की वास्तविक उपलब्धि – खगेश्वर चौबे अधिवक्ता

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अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

रायपुर – आज पूरे देश में आयोजित लोक अदालत के दौरान लोक अदालत , न्याय और वकालत के बारे में प्रकाश डालते हुये अधिवक्ता खगेश्वर प्रसाद चौबे ने कहा कि लोक अदालत संवाद , सहमति और न्याय का मानवीय स्वरूप है। जहां समझौता हार नही , बल्कि समाज की जीत बन जाता है। न्यायालय की चौखट पर आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल एक मुकदमा लेकर नहीं आता , वह अपने साथ आशा , पीड़ा , सम्मान , संघर्ष और न्याय की अपेक्षा भी लेकर आता है। एक अधिवक्ता के रूप में मेरा अनुभव यही रहा है कि अदालत केवल कानून की धाराओं और दलीलों का मंच नहीं है , बल्कि यह समाज के विश्वास , संवेदनशीलता और नैतिक संतुलन को बनाये रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था है। वकालत केवल एक पेशा नहीं , बल्कि जनविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

आज पूरे देश में आयोजित लोक अदालत ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल निर्णय देना नहीं , बल्कि समाज में संतुलन , सौहार्द और विश्वास बनाए रखना भी है। लोक अदालतें केवल लंबित मामलों के निराकरण का माध्यम नहीं हैं , बल्कि वे भारतीय न्याय प्रणाली की उस मानवीय सोच का प्रतीक हैं जिसमें विवाद से अधिक महत्व समाधान को दिया जाता है। यह व्यवस्था बताती है कि हर संघर्ष का अंत कटुता में नहीं बल्कि सहमति , संवाद और समझदारी में भी हो सकता है। वकालत के लम्बे अनुभव में मैंने देखा है कि अनेक प्रकरण ऐसे होते हैं जहाँ कानून अपना कार्य कर देता है , किन्तु संबंध टूट जाते हैं। परिवार बिखर जाते हैं , वर्षों की आत्मीयता समाप्त हो जाती है और समाज में कटुता बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में यदि समय रहते संवाद , मध्यस्थता और समझौते का मार्ग अपनाया जाये , तो न्याय केवल कागजों तक सीमित नहीं रहता बल्कि लोगों के जीवन में भी दिखाई देता है। यही कारण है कि आज वैकल्पिक विवाद समाधान और लोक अदालतों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

एक अधिवक्ता के रूप में मेरा सदैव यह मानना रहा है कि किसी प्रकरण में अधिवक्ता की जीत से अधिक महत्वपूर्ण न्याय की जीत होना चाहिये। यदि केवल मुकदमा जीतना ही उद्देश्य बन जाये , तो न्याय का मूल भाव कमजोर पड़ सकता है। अधिवक्ता का दायित्व केवल अपने पक्ष की दलील रखना नहीं , बल्कि न्यायालय को सत्य तक पहुँचने में सहयोग देना भी है। कई बार ऐसा अवसर आता है जब आपसी सहमति , संवेदनशील दृष्टिकोण और समझौते का मार्ग किसी लम्बी कानूनी लड़ाई से अधिक प्रभावी सिद्ध होता है। वहीं अधिवक्ता की वास्तविक भूमिका और परिपक्वता सामने आती है। वर्तमान समय में न्याय व्यवस्था तेजी से बदल रही है। ई-फाइलिंग , वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग , डिजिटल दस्तावेज और ऑनलाइन सुनवाई जैसी व्यवस्थाओं ने अदालतों को नई गति और सुविधा प्रदान की है। किन्तु इसके साथ यह जिम्मेदारी भी बढ़ी है कि न्याय व्यवस्था केवल तकनीकी रूप से मजबूत ना हो , बल्कि मानवीय मूल्यों से भी जुड़ी रहे। कानून का उद्देश्य केवल प्रक्रिया पूरी करना नहीं , बल्कि वास्तविक न्याय सुनिश्चित करना है।

आज समाज में बढ़ते विवादों का एक बड़ा कारण संवाद की कमी भी है। छोटी-छोटी बातें वर्षों के मुकदमों में बदल जाती हैं और अनेक लोग न्याय की प्रक्रिया में मानसिक , सामाजिक तथा आर्थिक रूप से थक जाते हैं। ऐसे समय में अधिवक्ता केवल कानूनी प्रतिनिधि नहीं रहता , बल्कि वह अपने मुवक्किल के लिये मार्गदर्शक , सलाहकार और विश्वास का आधार भी बन जाता है। एक संवेदनशील अधिवक्ता अपने पक्षकार को केवल संघर्ष का रास्ता नहीं दिखाता , बल्कि जहाँ संभव हो वहाँ समाधान का मार्ग भी सुझाता है। लोक अदालत की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें निर्णय थोपा नहीं जाता , बल्कि सहमति से समाधान खोजा जाता है। इसमें दोनों पक्षों को यह अनुभव होता है कि उन्होंने हार नहीं मानी , बल्कि एक बेहतर सामाजिक वातावरण के लिये समझदारी दिखाई है। यही न्याय का सबसे सुंदर स्वरूप है।

अदालतों में हर जीत वास्तव में जीत नहीं होती और हर समझौता हार नहीं होता। कई बार आपसी सहमति से समाप्त हुआ विवाद परिवार , संबंध और सामाजिक विश्वास – तीनों को बचा लेता है। अंततः मेरा अनुभव यही कहता है कि वकालत की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल मुकदमा जीतना नहीं , बल्कि न्याय को जीत दिलाना है। जब अधिवक्ता अपने ज्ञान , विवेक और संवेदनशीलता का उपयोग समाज में संतुलन स्थापित करने के लिये करता है , तभी वकालत अपने वास्तविक अर्थों में समाज सेवा बनती है। न्यायालय की गरिमा , अधिवक्ता की निष्ठा और समाज का विश्वास – यही हमारी न्याय व्यवस्था की वास्तविक शक्ति है।