April 19, 2026

महापुरुषों के प्रयास

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दिग्विजय राठौर किररिहा

रूढ़िवादी का अर्थ है वह व्यक्ति या विचारधारा जो परंपरागत मूल्यों, रीति-रिवाजों और सामाजिक संरचनाओं को बनाए रखने में विश्वास रखती है। रूढ़िवादी लोग बदलाव के प्रति सतर्क या विरोधी हो सकते हैं और वे पुराने तरीकों, नियमों और मान्यताओं को प्राथमिकता देते हैं। रूढ़िवादी विचारधारा समाज की धरोहर है। इस विचारधारा का प्रवाह वृद्धजनों से युवाओं की ओर होता है। आमतौर पर बुजुर्ग समाज की परंपराओं के संरक्षक और वाहक माने जाते हैं। वे परंपराओं के ‘जीवंत भंडार’ होते हैं, जो समय के साथ विलुप्त हो रही रीतियों को बचाए रखते हैं। ये रीतियां सकारात्मक और नकारात्मक दोनों होती हैं। इसलिए, परंपराएँ ऐसी होनी चाहिए जो समाज को उन्नति की ओर प्रेरित करें। अवनति के लिए कुछ न करना भी पर्याप्त होता है। सभी रीतियां बहुजन हिताय हों, यह आवश्यक नहीं है। इसमें एक पक्ष श्रद्धा रखता है, तो दूसरा पक्ष पीड़ित भी हो सकता है।

कभी हिम्मत करके समाज के विपरीत जाकर देखो, कैसा लगता है। रूढ़िवादी विचारधाराओं के विरुद्ध कदम उठाने में कैसा अनुभव होता है, यह समझने की कोशिश करो।

कल्पना कीजिए कि जब पीड़ित पक्ष इस परंपरा का विरोध करे और इसके बंद करने या सुधार की मांग करे, तब क्या होगा? प्रारंभ में इसका पुरजोर विरोध होगा, फिर धीरे-धीरे समर्थन मिलेगा। समर्थन भी तभी मिलेगा, जब इस विरोध में ठोस तर्क और कोई वैकल्पिक व्यवस्था होगी। हमारा समाज अक्सर ऐसे लोगों को वर्तमान में स्वीकार नहीं करता, क्योंकि हमारे देश में मुर्दों को पूजने की परंपरा रही है।

समाज की रूढ़ियों को मिटाने के लिए जिन्होंने भी प्रयास किया, प्रारंभ में वे आलोचना के पात्र ही बने हैं। संत कबीर दास, मीराबाई, सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा राव फुले जैसे महान व्यक्तित्वों ने समाज की रूढ़िवादी विचारधाराओं के विरुद्ध संघर्ष किया। उनकी स्थापित मिसालों को आज भले ही राजनीति का रूप देकर वोट बटोरे जा रहे हों, लेकिन उनके वे क्रांतिकारी निर्णय, जिन्होंने तत्कालीन समाज की नींव हिला दी थी, भुलाए नहीं जा सकते।

संत कबीर ने बाहरी आडंबरों की निंदा की। मीराबाई ने अछूतों के साथ मिलकर कृष्ण भक्ति की और सती प्रथा से बचने का मार्ग अपनाया। सावित्रीबाई फुले ने शूद्र महिला होते हुए भी शिक्षा ग्रहण की और बालिका शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। ज्योतिबा राव फुले ने समाज की परंपराओं को चुनौती देते हुए अनेक क्रांतिकारी निर्णय लिए और शिक्षा को मनुष्य का सबसे बड़ा हथियार बताया। जेल में रहते हुए भगत सिंह ने बोधा नामक सफाई कर्मी के हाथ की रोटी खाने की इच्छा व्यक्त की। वे सामाजिक रूढ़ियों को स्वयं तोड़कर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते थे, न कि केवल दूसरों से अपेक्षा करके।

ये सभी घटनाएँ उस समय की हैं, जब देश में न सोशल मीडिया था, न पत्र-पत्रिकाओं का व्यापक प्रचलन। रेडियो भी बहुत सीमित था। इन सभी कार्यों को उन्होंने स्वयं मैदान में उतरकर किया और अपने कर्मों को ही प्रचार का माध्यम बनाया।

रूढ़िवाद समय के अनुरूप अपने स्वरूप में परिवर्तन भी लाता है। ज्यों – ज्यों यह संसार परिवर्तनशील है त्यों – त्यों ये प्रथाएं भी परिवर्तनशील रहनी चाहिए। जैसा समय परिस्थिति हो उसके अनुरूप प्रथाएं प्रचलित होनी चाहिए। समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है। ऐसे परंपराओं से  कोई एक पक्ष को इसे ढोने पर विवश नहीं होना पड़ता।

रूढ़िवादी विचारधारा का शिकार वैसे तो पूरा समाज ही होता है, परंतु विशेष रूप से महिलाएं इसका मुख्य शिकार होती रही हैं। उनका अनेक प्रकार से शोषण होता था। उन्हें आज भी निशाना बनाया जाता है—कभी मासिक धर्म के नाम पर, कभी सुहागन होने के नाम पर, तो कभी केवल लिंग के आधार पर। आमतौर पर मुखाग्नि देने की परंपरा, या यूं कहें कि माता-पिता के अंतिम संस्कार का दायित्व पुत्र ही निभाते रहे हैं। परंतु अब इस रूढ़िवादी सोच के विरुद्ध एक नई और सकारात्मक सोच ने मोर्चा खोल दिया है। अब पुत्रियां भी इस संस्कार को पूरा कर रही हैं।

घूंघट से संबंधित लोकोक्तियां –

(1) नटनी बांस चढ़ी तो अब घूंघट कैसा, (2) जब नाचने निकली तो घूंघट क्या

पर्दा से संबंधित मुहावरे –

(1) आंखों से पर्दा उठ जाना, (2) पर्दा फाश करना।

इस तरह की अनेक लोकोक्ति और मुहावरों से ज्ञात होता है कि घूंघट या पर्दा का कार्य है ढकना या छिपाना। भारत में घूंघट प्रथा एक प्राचीन सामाजिक रीति है जिसका अर्थ विवाहित महिलाओं द्वारा साड़ी के पल्लू या दुपट्टे से अपना चेहरा या सिर ढंकना है। इसे प्राय बड़ों के प्रति सम्मान, लज्जा और मर्यादा का प्रतीक माना जाता है। उत्तर भारत में इस प्रथा का व्यापक प्रचलन है जिसका सीधा संबंध इस्लामी आक्रमणों और मुगल काल के दौरान महिलाओं की सुरक्षा से बताया गया है।

परंतु तत्कालीन परिस्थितियों में लिये गए किसी निर्णय का एक प्रथा बन जाना और उसे अगले सैकड़ों वर्षों तक ढोते रहना क्या तर्कपूर्ण है? क्या सम्मान और मर्यादा को बिना पर्दा या घूंघट के व्यक्त नहीं किया जा सकता? या जेठ और ससुर का अपमान घूंघट की आड़ से नहीं होता? सम्मान और मर्यादा का बोझ प्रायः महिलाएं ही उठाती आ रही हैं पुरुष क्यों नहीं? हरियाणा सरकार ने इस प्रथा की रोक पर अनेक अभियान चलाए हैं। आधुनिक डिजिटल युग में यह प्रथा अब एक हास्यास्पद बन गई है।

निष्कर्ष :-

धीरे-धीरे समाज में रूढ़िवाद कम होता जा रहा है। शिक्षा रूढ़िवाद को पूरी तरह समाप्त तो नहीं कर सकती, परंतु उसे कम अवश्य कर सकती है। शिक्षित समाज तार्किक क्षमता की ओर अग्रसर रहता है। समाज का विकास उसकी संस्कृति और कुप्रथा दोनों पर निर्भर करती है। संस्कृति को तार्किक रूप से समझ कर और कुप्रथाओं को त्याग कर एक विकसित समाज का निर्माण किया जा सकता है। वे क्रांतिवीर समस्याओं में उलझकर नहीं रहे, बल्कि उन्हें एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उस समय की सामाजिक रूढ़िवादिता सभी के लिए चुनौती थी, लेकिन उसका विरोध करने का साहस हर किसी में नहीं था। यदि वे साहसी नहीं होते, तो आज की स्थिति शायद कुछ और होती। इसलिए, जीवन में एक बार जोखिम जरूर उठाकर देखें—जीत गए तो सफलता मिलेगी और हार गए तो अनुभव और समझ बढ़ेगी। झूठ के खिलाफ एक बार आवाज जरूर उठाएँ; क्या पता, कोई उसी आवाज का इंतजार कर रहा हो। आपकी आवाज सुनकर वह भी सत्य का साथ देने लगे।

(लेखक- किरंदुल, दंतेवाड़ा में शिक्षक है)